How to file a civil case in court in Hindi - दीवानी मुकदमा दायर करने का पूरा प्रोसेस

भारत में सिविल केस दर्ज कराने के लिए एक Detailed process है और यदि उस process का पालन नहीं किया जाता है, तो रजिस्ट्रार के पास केस को खारिज करने का अधिकार होता है.

How to file a civil case in court in Hindi - दीवानी मुकदमा दायर करने का पूरा प्रोसेस

भारत में सिविल केस दर्ज कराने के लिए एक Detailed process है और यदि उस process का पालन नहीं किया जाता है, तो रजिस्ट्रार के पास केस को खारिज करने का अधिकार होता है.

1.मुकदमा दायर करना - Filing of Suit

आम आदमी की भाषा में मुक़दमे का अर्थ “लिखित शिकायतया आरोप” है. जो व्यक्ति मुकदमा दर्ज करवाता है, उसे "वादी (Plaintiff और जिसके खिलाफ केस दर्ज किया जाता है, उसे "प्रतिवादी"Defendant कहा जाता है. शिकायतकर्ता को अपना मुकदमा Limitation Act 1963 में केस करने का जो टाइम पीरियड दिया गया है उसके अंदर ही दर्ज कराना होता है। मुक़दमे की कॉपी टाइप होनी चाहिए और उस पर court का नाम, complaint की nature, parties का नाम और address clear लिखा होना चाहिए. मुक़दमे में वादी Plaintiff द्वारा दिया गया शपथ-पत्र भी Attached होना चाहिए, जिसमें यह कहा गया हो कि complaint में लिखी हुई सभी बातें सही हैं

2.वकालतनामा - Vakalatnam

"वकालतनामा" एक ऐसा document है, जिसके द्वारा कोई पार्टी केस दर्ज करवाने के लिए वकील को अपनी ओर से Representation करने के लिए authorized करती है
वकालतनामा में कुछ बातें लिखी हुई होती है जैसे

  1. मुवक्किल किसी भी फैसले के लिए वकील को जिम्मेदार नहीं ठहराएगा.
  2. मुवक्किल अदालती कार्यवाही  (Judicial proceeding) के दौरान किए गए सभी खर्चों को वहन करेगा.
  3. जब तक वकील को पूरी फीस का भुगतान नहीं किया जाता है, तब तक उसे केस से संबंधित सभी दस्तावेजों को अपने पास रखने का अधिकार होगा.
  4. मुवक्किल  अदालती कार्यवाही के किसी भी level पर वकील को छोड़ने के लिए free है.
  5. वकील को अदालत में सुनवाई के दौरान मुवक्किल के हित में अपने दम पर फैसला लेने का पूरा अधिकार होगा.

वकालतनामा को मुक़दमे की कॉपी के आखिरी page के साथ जोड़कर अदालत के रिकॉर्ड में रखा जाता है. वकालतनामा तैयार करवाने के लिए कोई शुल्क की आवश्यकता नहीं होती है. हालांकि, आजकल दिल्ली हाई कोर्ट के नियमों के अनुसार वकालतनामा के साथ 10 रुपये का "अधिवक्ता कल्याण डाक टिकट" लगाया जाता है.

इसके बाद पहली सुनवाई के लिए, वादी को एक तारीख दी जाती है. इस दिन court यह तय करता है कि कार्यवाही को आगे जारी रखना है या नहीं. यदि वह निर्णय करता है कि इस मामले में कोई सच्चाई नहीं है तो वह "प्रतिवादी" को बुलाए बिना ही केस को खारिज कर देता है. लेकिन यदि court को लगता है कि इस मामले में कोई सच्चाई है तो वह कार्यवाही को आगे जारी रखता है.

3.अदालती कार्यवाही - Court proceedings

सुनवाई के पहले दिन यदि अदालत को लगता है कि इस मामले में सच्चाई है तो वह प्रतिवादी पक्ष को एक निश्चित तारीख तक अपना पक्ष दर्ज कराने के लिए नोटिस भेजता है. प्रतिवादी पक्ष को नोटिस भेजने से पहले वादी को निम्नलिखित कार्य करना आवश्यक है:

  • अदालती कार्यवाही के लिए आवश्यक शुल्क का भुगतान
  • अदालत में प्रत्येक प्रतिवादी के लिए case की 2 copy जमा करना अर्थात यदि 3 प्रतिवादी हैं, तो case की 6 copies जमा करनी होगा. प्रत्येक प्रतिवादी के पास case की 2 copies में से एक को रजिस्ट्री डाक/कूरियर के द्वारा भेजा जाता है, जबकि दूसरी copy को साधारण पोस्ट द्वारा भेजा जाता है.
  • अदालत में प्रतिवादी के पास भेजे जाने वाले case की copies को आदेश/नोटिस जारी करने की तारीख से 7 दिनों के भीतर जमा करना पड़ता है.

4.लिखित बयान – Written Statement

जब प्रतिवादी को नोटिस जारी कर दिया जाता है तो उसे नोटिस में दर्ज की गई तारीख पर कोर्ट में पेश होना अनिवार्य होता है। ऐसी तारीख से पहले प्रतिवादी को अपना लिखित बयान दर्ज कराना होता है अर्थात उसे 30 दिन के भीतर वादी द्वारा लगाए गए आरोपों के खिलाफ अपना बचाव तैयार करना पड़ता है। लिखित बयान में विशेष रूप से उन आरोपों को इंकार करना चाहिए जिनके बारे में प्रतिवादी सोचता है कि वह झूठ है।

यदि लिखित बयान में किसी विशेष आरोप से इनकार नहीं किया जाता तो ऐसा समझा जाता है कि प्रतिवादी उस आरोप को स्वीकार्य करता है और लिखित बयान में प्रतिवादी का शपथ पत्र भी संलग्न होना चाहिए जिसमें यह कहा गया हो कि लिखित बयान में लिखी गई सारी बातें सच है। लिखित बयान दर्ज कराने के लिए निर्धारित समय सीमा 30 दिनों की अवधि है और कोर्ट की अनुमति से 90 दिन तक बढ़ाई जा सकती है।

5.Replication by Plaintiff - वादी द्वारा प्रतिकृति

"Replication" वह जवाब है जो वादी द्वारा प्रतिवादी के "लिखित बयान" के खिलाफ दर्ज कराया जाता है. "Replication" में वादी को लिखित बयान में उठाए गए आरोपों से इनकार करना चाहिए. यदि "Replication" में किसी विशेष आरोप से इनकार नहीं किया जाता है तो ऐसा समझा जाता है कि वादी उस आरोप को स्वीकार करता है. "Replication" में वादी का शपथ-पत्र भी संलग्न होना चाहिए, जिसमें यह कहा गया हो कि "Replication" में लिखी गयी सभी बातें सही है. एक बार जब "Replication" दर्ज हो जाती है तो याचिका (Petition) पूरी हो जाती है

6.दस्तावेजों को जमा करना - Filing of Documents

जब एक बार याचिका पूरी हो जाती है तो उसके बाद दोनों पार्टियों को उन दस्तावेजों को जमा कराने का अवसर दिया जाता है, जिन पर वे भरोसा करते हैं और जो उनके दावे को सिद्ध करने के लिए आवश्यक हैं. अंतिम सुनवाई के दौरान ऐसे किसी दस्तावेज को मान्यता नहीं दी जाती है, जिसे अदालत के सामने पहले पेश नहीं किया गया है. एक बार दस्तावेज स्वीकार कर लेने के बाद वह अदालत के रिकॉर्ड का हिस्सा हो जाता है और उस पर केस से संबंधित सभी विवरण जैसे पक्षों के नाम, केस का title आदि (O 13 R 49 7) लिख दिया जाता है. कोर्ट में सभी दस्तावेज की ओरिजिनल कॉपी जमा कर ली जाती है और उनकी एक कॉपी Opposition party को दे दी जाती है।

7.मुद्दों का निर्धारण - Framing of Issues

इसके बाद अदालत द्वारा उन "मुद्दों" को तैयार किया जाता है, जिसके आधार पर बहस और गवाहों से पूछताछ की जाती है. अदालत द्वारा मुकदमे से जुड़े विवादों को देखते हुए मुद्दों को तैयार किया जाता है और दोनों पार्टियों को "मुद्दे" के दायरे से बाहर जाने की अनुमति नहीं होती है. ये मुद्दे या तो Factual हो सकते हैं या कानूनी हो सकते है. last order pass करते समय अदालत प्रत्येक मुद्दों पर अलग से विचार करती है और प्रत्येक मुद्दे पर अलग से निर्णय देती है.

8.गवाहों की सूची - List of witness

दोनों पार्टियों को केस दर्ज कराने की तारीख से 15 दिन के भीतर या अदालत fix time के भीतर अपने-अपने गवाहों की सूची अदालत में पेश करनी पड़ती है. दोनों पक्ष या तो गवाह को स्वंय बुलाते हैं या अदालत से उनसे समन भेजने के लिए कह सकते हैं. अगर court किसी गवाह को समन भेजता है तो ऐसे गवाह को बुलाने के लिए Related party को अदालत के पास पैसे जमा करने पड़ते हैं, जिसे "आहार मनी" (Diet Money) कहा जाता है.

last में fix date पर, दोनों parties द्वारा गवाह से पूछताछ की जाती है. किसी पार्टी द्वारा अपने स्वयं के गवाहों से पूछताछ करने की प्रक्रिया को "एग्जामिनेशन-इन-चीफ" (Examination-in-chief) कहा जाता है, जबकि किसी पार्टी द्वारा Opposition party के गवाहों से पूछताछ करने की प्रक्रिया को "क्रॉस एग्जामिनेशन" (cross Examination) कहा जाता है. एक बार, जब गवाहों से पूछताछ की प्रक्रिया समाप्त हो जाती है और दस्तावेजों की जांच कर ली जाती है, तो court अंतिम सुनवाई के लिए तारीख तय करता है

9.अंतिम सुनवाई - Final Hearing

अंतिम सुनवाई के लिए fix date को दोनों पक्ष अपने Argument submit करते हैं. दोनों पक्षों को अपने Argument submit करते समय केस से संबंधित मुद्दों का ख्याल रखना पड़ता है. Final argument से पहले दोनों parties court की अनुमति से अपनी याचिकाओं (petitions) में संशोधन कर सकते हैं. last में, court "अंतिम फैसला" सुनाता है, जिसे या तो उसी तिथि को या अदालत द्वारा निर्धारित किसी अन्य तिथि को सुनाया जाता है.

10.आदेश की प्रमाणित प्रति - Certified copy of order

order की Certified copy उसे कहते हैं जिसमें अदालत के अंतिम आदेश के साथ अदालत की मुहर लगी होती है. अदालत द्वारा जारी आदेश के execution में या अपील के मामले में order की Certified copy काफी उपयोगी होती है. order की Certified copy लेने के लिए मामूली fees के साथ, related court के रजिस्ट्री ऑफिस में आवेदन किया जा सकता है. हालांकि तत्काल आवश्यकता के मामले में कुछ अतिरिक्त राशि भी जमा करनी पड़ती है. "तत्काल आदेश" एक सप्ताह के भीतर प्राप्त किया जा सकता है, जबकि सामान्य रूप से आदेश की Certified copy प्राप्त करने में 15 दिन लग सकते हैं.

11. Appeal, Reference and Review

जब किसी पार्टी के खिलाफ कोई order pass किया जाता है, तो ऐसा नहीं है कि उसके पास कोई उपाय नहीं होता है. ऐसी पार्टी Appeal, Reference and Review के माध्यम से कार्यवाही को आगे बढ़ा सकती है